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शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

देशद्रोह के आरोपी छात्रो का परिचय और भविष्य का संकट।

जेएनयू के जिन छात्रों से देश को खतरा है, हमारे लिए उनका परिचय जानना जरूरी है।

1. कन्हैया कुमार-  छात्रसंघ अध्यक्ष। पिताजी अपाहिज है तथा माँ तीन हजार रू पगार में आँगनवाडी में कार्य करती है, उनकी कमाई से ही पूरे परिवार का पेट पलता है।

2. राम नागा - छात्रसंघ महासचिव। गरीब दलित परिवार से है। भूखमरी के लिए कुख्यात कालाहांडी के निवासी हैं।

3. चिंटु कुमारी - छात्रसंघ की पूर्व महासचिव। बिहार के दलित परिवार से है। इसकी माँ चूडियाँ बेचकर घर चलाती है।

4. लेनिन कुमार - छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष। तमिलनाडु के निवासी। न पूरी तरह अंग्रेजी जानते हैं, न हिन्दी। बावजूद जेएनयू ने उन्हे अपना नेता चुना।

5. उमर खालिद - नास्तिक है। इन्होंने येल विश्वविद्यालय की फैलोशिप का प्रस्ताव इसलिए ठुकरा दिया, क्योंकि उन्हें दलित व आदिवासियों के लिए काम करना था।
               इनमें से किसी के खिलाफ अभी तक पुलिस एक भी सबूत पेश नहीं पेश कर सकी । और जो सबूत पेश किये गए वे फर्जी निकले। बावजूद इन्हें देशद्रोही करार देकर पूरे देश में बदनाम कर दिया गया। गरीब, मजदूर, किसान और दलित परिवार से आने वाले ये बच्चे देशद्रोही हो गये और जनता का लाखों करोडो पैसा लूटकर विदेशी बैंकों में जमा करने वाले सबसे बड़े देश भक्त हो गये। सरकार ने उन्हीं देशभक्त कारोबारी घरानों के एक हिस्से के 1 लाख 14 हजार करोड़ रूपये माफ कर दिये । न कोई  चूं हुई और न ही चर्चा। दरअसल बीजेपी मनुवादी कोख से पैदा हुई पार्टी है। लिहाजा इसका बुनियादी चरित्र ही दलित, आदिवासी, महिला, गरीब, मुस्लिम विरोधी है।कॉरपोरेट परस्त होने के नाते मजदूरों, किसानों और प्रगतिशील विचार रखने वाले नौजवानों से 36 का रिश्ता है। केन्द्र सरकार इनकी समस्याओं का हल करने के बजाय समस्याओं का स्रोत बन गई है।
         लोकतंत्र संस्थाओं से चलता है। लेकिन आज संस्थाओं को ही अपाहिज किया जा रहा है। फांसीवाद का जन्म ऐसे ही होता है। संकट की इस घड़ी में लोकतांत्रिक प्रगतिशील विचार रखने वाली ताकतों को एकजुटता दिखाते हुए अपने अपने मोर्चों पर मुश्तेन्दी दिखाना जरूरी हो गया है। अभी एकजुट नहीं हुए, तो फिर बहुत देर हो चुकी होगी।

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2016

बीजेपी और मोदी के खिलाफ नारेबाजी

जेएनयू में शुरू हुए बवाल के बीच छात्र मार्च में शामिल लोग 'बीजेपी और मोदी सरकार मुर्दाबाद' के नारे लगा रहे हैं. आम आदमी पार्टी के कई नेता पहले ही जंतर-मंतर पहुंच चुके थे. लगभग एक हजार छात्रों के इस मार्च में डॉ. भीमराव अंबेडकर के पोते प्रकाश अंबेडकर और रोहित वेमुला के परिवार के लोग भी शामिल हुए. प्रकाश अंबेडकर ने कहा, 'हम कन्हैया और रोहित वेमुला दोनों को न्याय दिलाने के लिए हम मार्च निकाल रहे हैं.

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2016

जेएनयू के बहाने देशभक्ति और देशद्रोह पर छिड़ी इस पूरी बहस के अलग-अलग पक्ष

जो लोग यह मान रहे हैं कि महज दस लड़कों के कुछ नासमझी भरे नारों के लिए जेएनयू को बदनाम किया जा रहा है, वे दरअसल एक भारी भूल कर रहे हैं। यह जेएनयू से ज्यादा जेएनयू की अवधारणा है जो बीजेपी, संघ परिवार और दक्षिणपंथी विचारधारा को स्वीकार्य नहीं है।

जेएनयू के बहाने देशभक्ति और देशद्रोह पर छिड़ी इस पूरी बहस के अलग-अलग पक्षों को देखें तो यह बात साफ़ तौर पर समझ में आ जाएगी। मसलन जो लोग जेएनयू के नारों का विरोध कर रहे हैं, वे हैदराबाद यूनिवर्सिटी में रोहित वेमुला की ख़ुदकुशी से भी आंख मिलाने को तैयार नहीं हैं। जो लोग जेएनयू को देशद्रोहियों का अड्डा बता रहे हैं, वे मूलतः आरक्षण विरोधी और उदारीकरण के समर्थक तत्व हैं। जो लोग मानते हैं कि जेएनयू आज़ादी के नाम पर अराजकता फैला रहा है, वे स्त्री की बराबरी और आज़ादी के भी ख़िलाफ़ खड़े लोग हैं।

ये वही लोग हैं जो कश्मीर समस्या और माओवाद के संकट को किसी आंतरिक परिस्थिति की तरह देखने को तैयार नहीं हैं, बल्कि यह चाहते हैं कि इनका उस तरह दमन कर दिया जाए जैसे आक्रांता सेनाएं किसी दूसरे देश के नागरिकों का करती हैं। यही वे लोग हैं जो जातिवाद को गलत बताते हैं लेकिन अपनी जाति के बाहर जाकर शादी करने को तैयार नहीं होते और अख़बारों में बिल्कुल जातिगत पहचानों वाले विज्ञापन देते हैं। ये वही लोग हैं जिन्हें दलितों का, पिछड़ों का, अल्पसंख्यकों का और स्त्रियों का आगे बढ़ना नहीं सुहाता। ये वही लोग हैं जो सरकारी या केंद्रीय विश्वविद्यालयों के सामाजिक माहौल में नहीं जाते और निजी तकनीकी संस्थानों की मूलतः कारोबारी शिक्षा वाली व्यवस्था को सबसे आदर्श मानते हैं।

यही वे लोग हैं जो मानते हैं कि विश्वविद्यालयों में बस कोर्स पूरा करना चाहिए और डिग्री लेकर एक अच्छी नौकरी करनी चाहिए, बहस नहीं करनी चाहिए और राजनीति तो बिल्कुल नहीं। यही लोग हुसैन की कलाकृतियां जलाते हैं, हबीब तनवीर के नाटकों में बाधा डालते हैं और लेखकों के विरोध को राजनीतिक साज़िश की तरह देखते हैं। फिर यही वे लोग हैं जो अयोध्या में एक भव्य राम मंदिर चाहते हैं, जैश-लश्कर से लेकर आईएस-अल क़ायदा तक की मिसालें देते हुए साबित करते हैं कि मुसलमान आतंकवादी हैं और शिकायत करते हैं कि इसी मुल्क में बोलने की इतनी आज़ादी है कि लोग देश और धर्म की भी आलोचना कर बैठते हैं।

दूसरी तरफ जो लोग रोहित वेमुला के अकेलेपन और उसकी बिल्कुल प्राणांतक उदासी में साझा करते हैं, वही कन्हैया और उसके साथ खड़े होने का दम दिखाते हैं। जो लोग इस पूरी व्यवस्था में हाशिए पर हैं, जो चंपू पूंजीवाद और अलग-अलग सत्ताओं के गठजोड़ से बनी एक बेईमान और अन्यायपूर्ण राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था के शिकार हैं, वे देश के नाम पर ठगे जाने को तैयार नहीं हैं। इत्तिफाक से यही वे लोग हैं जो नई बहसों, नए चलनों, नए राजनीतिक प्रयोगों और नई क्रांतियों के वाहक हैं और अपने-अपने संस्थानों और विश्वविद्यालयों में अति तक जा सकने वाली बहसें करते रह सकते हैं।

यही वे लोग हैं जो कलबुर्गी, पंसारे और दाभोलकर के मारे जाने का विरोध करते हैं, इसके लिए प्रदर्शन करते हैं और अपने पुरस्कार लौटाते हैं। अगर ध्यान से देखें तो बंगाल से महाराष्ट्र तक, छत्तीसगढ़ से तेलंगाना तक और गुजरात से कर्नाटक तक जो लोग कहीं मेधा पाटकर की बांध विरोधी लड़ाई में शामिल हैं, कहीं उदयकुमार के साथ ऐटमी कारख़ानों का विरोध कर रहे हैं, कहीं सोनी सोरी के साथ हुए अत्याचार को उजागर कर रहे हैं, कहीं अख़लाक के मारे जाने का मातम मना रहे हैं, कहीं गैंगरेप की शिकार किसी लड़की के हक़ में आंदोलन कर रहे हैं और कहीं मानवाधिकार की किसी दूसरी लड़ाई के सिपाही बने हुए हैं, वही हैदराबाद से जेएनयू तक पसरे हुए हैं। ये एक अलग सा भारत है- बहुत सारे रंगों से भरा हुआ, बहुत सारे विश्वासों से लैस, बहुत सारी बहसें करता है, बहुत सारे अभावों के बीच गुज़रता हुआ, कहीं पिटता हुआ, कहीं जेल जाता हुआ- जो इस देश पर शासन कर रही सरकारों को समझ में नहीं आता है। वे इस भारत को कुचलना चाहती हैं, क्योंकि वह असहमति जताता है, सवाल पूछता है, नारे लगाता है और कभी-कभार अपनी हताशा या अपने गुस्से में अपने अलग होने की बात भी कह डालता है।

यह लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं हैं

जेएनयू की घटना को जिस तरह से टीवी चैनलों में कवर किया गया है उसे आप अपने अपने दल की पसंद की हिसाब से मत देखिये। उसे आप समाज और संतुलित समझ की प्रक्रिया के हिसाब से देखिये। क्या आप घर में इसी तरह से चिल्ला कर अपनी पत्नी से बात करते हैं। क्या आपके पिता इसी तरह से आपकी मां पर चीखते हैं। क्या आपने अपनी बहनों पर इसी तरह से चीखा है। ऐसा क्यों हैं कि एंकरों का चीखना बिल्कुल ऐसा ही लगता है। प्रवक्ता भी एंकरों की तरह धमका रहे हैं। सवाल कहीं छूट जाता है। जवाब की किसी को परवाह नहीं होती। मारो मारो, पकड़ो पकड़ो की आवाज़ आने लगती है। एक दो बार मैं भी गुस्साया हूं। चीखा हूं और चिल्लाया हूं। रात भर नींद नहीं आई। तनाव से आंखें तनी रही। अक्सर सोचता हूं कि हमारी बिरादरी के लोग कैसे चीख लेते हैं। चिल्ला लेते हैं। अगर चीखने चिल्लाने से जवाबदेही तय होती तो रोज़ प्रधानमंत्री को चीखना चाहिए। रोज़ सेनाध्यक्ष को टीवी पर आकर चीखना चाहिए। हर किसी को हर किसी पर चीखना चाहिए। क्या टीवी को हम इतनी छूट देंगे कि वो हमें बताने की जगह धमकाने लगे। हममें से कुछ को छांट कर भीड़ बनाने लगे और उस भीड़ को ललकारने लगे कि जाओ उसे खींच कर मार दो। वो गद्दार है। देशद्रोही है। एंकर क्या है। जो भीड़ को उकसाता हो, भीड़ बनाता हो वो क्या है। पूरी दुनिया में चीखने वाले एंकरों की पूछ बढ़ती जा रही है। आपको लगता है कि आपके बदले चीख कर वो ठीक कर रहा है। दरअसल वो ठीक नहीं कर रहा है।

कई प्रवक्ता गाली देते हैं। मार देने की बात करते हैं। गोली मार देने की बात करते हैं। ये इसलिए करते हैं कि आप डर जाएं। आप बिना सवाल किये उनसे सहमत हो जाएं। हमारा टीवी अब आए दिन करने लगा है। एंकर रोज़ भाषण झाड़ रहे हैं। जैसे मैं आज झाड़ रहा हूं। वो देशभक्ति के प्रवक्ता हो गए हैं। हर बात को देशभक्ति और गद्दारी के चश्मे से देखा जा रहा है। सैनिकों की शहादत का राजनीतिक इस्तेमाल हो रहा है। उनके बलिदान के नाम पर किसी को भी गद्दार ठहराया जा रहा है। इसी देश में जंतर मंतर पर सैनिकों के कपड़े फाड़ दिये गए। उनके मेडल खींचे गए। उन सैनिकों में भी कोई युद्ध में घायल है। किसी ने अपने शरीर का हिस्सा गंवाया है। कौन जाता है उनके आंसू पोंछने।

शहादत सर्वोच्च है लेकिन क्या शहादत का राजनीतिक इस्तेमाल भी सर्वोच्च है। कश्मीर में रोज़ाना भारत विरोधी नारे लगते हैं। आज के इंडियन एक्सप्रेस में किसी पुलिस अधिकारी ने कहा है कि हम रोज़ गिरफ्तार करने लगें तो कितनों को गिरफ्तार करेंगे। बताना चाहिए कि कश्मीर में पिछले एक साल में पीडीपी बीजेपी सरकार ने क्या भारत विरोधी नारे लगाने वालों को गिरफ्तार किया है। हां तो उनकी संख्या क्या है। वहां तो आए दिन कोई पाकिस्तान के झंडे दिखा देता है, कोई आतंकवादी संगठन आईएस के भी।

कश्मीर की समस्या का भारत के अन्य हिस्सों में रह रहे मुसलमानों से क्या लेना देना है। कोई लेना देना नहीं है। कश्मीर की समस्या इस्लाम की समस्या नहीं है। कश्मीर की समस्या की अपनी जटिलता है। उसे सरकारों पर छोड़ देना चाहिए। पीडीपी अफज़ल गुरु को शहीद मानती है। पीडीपी ने अभी तक नहीं कहा कि अफज़ल गुरु वही है जो बीजेपी कहती है यानी आतंकवादी है। इसके बाद भी बीजेपी पीडीपी को अपनी सरकार का मुखिया चुनती है। यह भी दुखद है कि इस बेहतरीन राजनीतिक प्रयोग को जेएनयू में कुछ छात्रों को आतंकवादी बताने के नाम पर कमतर बताया जा रहा है। बीजेपी ने कश्मीर में जो किया वो एक शानदार राजनीतिक प्रयोग है। इतिहास प्रधानमंत्री मोदी को इसके लिए अच्छी जगह देगा। हां उसके लिए बीजेपी ने अपने राजनीतिक सिद्धांतों को कुछ समय के लिए छोड़ा उसे लेकर सवाल होते रहेंगे। अफज़ल गुरु अगर जेएनयू में आतंकवादी है तो श्रीनगर में क्या है। इन सब जटिल मसलों को हम हां या ना कि शक्ल में बहस करेंगे तो तर्कशील समाज नहीं रह जाएंगे। एक भीड़ बन कर रह जाएंगे। यह लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है।

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2016

क्या भाजपा देश से बड़ी हो गयी है ?

क्या भाजपा देश से बड़ी हो गयी है ? यह प्रश्न उनसे पूछा जाना चाहिए जो बीजेपी-पीडीपी गठबंधन की आड़ में जेएनयू काण्ड को औचित्यपूर्ण ठहराना चाहते है । माना कि भाजपा ने सत्ता मोह में देशद्रोहियो से हाथ मिला लिया लेकिन इससे जेएनयू की घटना की गम्भीरता कम नही हो जाती । भाजपा की करतूत की सजा देश को नही दी जा सकती । इसका मतलब तो यह हुआ कि भाजपा देश से बड़ी हो गयी और यदि उसने गलत हरकत कर दी तो दुसरो को भी इसकी इजाजत मिल गयी । इस घटना से भाजपा को भी सबक मिल जाना चाहिए कि सत्ता के लिए सिद्धांतो से समझोता कितना घातक होता है । जब भी पीडीपी से गठबंधन की बात आती है, इनकी बोलती बन्द हो जाती है । एक राष्ट्रवादी पार्टी के लिए इससे ज्यादा शर्म की बात ओर क्या हो सकती है ।

सोमवार, 15 फ़रवरी 2016

असल मुद्दों से ध्यान भटकाने का तरीका??

कुछ दिन पहले बीजेपी के ही स्टूडेंट विंग ABVP ने JNU में पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए (इसका सबूत आप पहले ही एक वीडियो में देख चुके हैं) और इसका इलज़ाम JNU के विद्यार्थियों पर लगा कर जेल में डाल दिया गया और फिर शुरू हो गयी देश भक्ति और देश द्रोही की बहस।

हर टीवी, अखबार, सोशल मीडिया, हर जगह ये बहस हो रही है।

ये सच मुच देश भक्ति का जोश है या फिर असल मुद्दों से ध्यान भटकाने का तरीका???

बीजेपी पहले भी ऐसे घटिया और नीच तरीकों का इस्तेमाल करके जनता का ध्यान असल मुद्दों से भटकाती रही है।

अब ज़रा गौर कीजिये पिछले कुछ दिनों में हुई बातों से जिन पर आपका ध्यान नहीं गया क्योंकि बीजेपी ने इस तरिके से आपका ध्यान भटका दिया

1) मोदी सरकार ने देश के गौरव PSLV (हांजी वही PSLV जिसने दूसरे देशों के उपग्रह भी अंतरिक्ष में पहुंचाए हैं और देश का नाम रौशन किया है) को प्राइवेट कंपनियों को बेचने की तैयारी कर ली है

2) देश की अर्थव्यवस्था चरमरा रही है। सेंसेक्स धड़ाम से नीचे गिरा है

3) अंतर्राष्ट्रीय बाजार में क्रूड आयल के दाम गिरने के बावजूद भी देश में पेट्रोल डीजल के दाम नहीं गिरे क्योंकि मोदी जी ने पेट्रोल डीजल पर एक्साइज ड्यूटी बढ़ा दी है।

4) जीडीपी के नए फॉर्मूले के हिसाब से आंकड़े तो ऊपर जा रहे हैं पर IIP के आंकड़े पाताल में घुसते जा रहे हैं।

5) मोदी जी के विरोध के बावजूद अमेरिका पकिस्तान को विमान बेच रहा है। मोदी जी की चमचागिरी और विदेश नीति की हवा निकल रही है।

6) मोदी सरकार ने उद्योगपतियों का 1.80 लाख करोड़ का ऋण माफ़ कर दिया। बैंक घाटे में चले गए।

7) लेकिन किसानो की फसलें नहीं खरीदी गयी ना ही उनको आर्थिक सहायता दी गयी। जो धान पिछले साल सरकार में 2100 में खरीदी थी वो अब्की बार प्राइवेट कंपनियों ने 900-1000 में खरीदी। किसानो पर कर्ज बढ़ता जा रहा है और उसकी मोदी जी को फ़िक्र नहीं।
लेकिन उद्योगपतियों का कर्ज माफ़ करने के लिए पैसे हैं मोदी जी के पास। दुसरे देशों को बांटने के लिए पैसे हैं मोदी जी के पास।

8) बाजार में मंदा पड़ा है। जमीन के भाव 25% रह गए। सभी व्यापारी खाली बैठे हैं। भ्रष्टाचार चरम पर है।

लेकिन, एक ही झटके में, मोदी जी ने अपने प्यादों की सहायता से लोगों का ध्यान इन सब मुद्दों से भटका कर, खुद ही बनायी हुई बहस में फंसा दिया।

इसे कहते हैं राजनीति !
लेकिन क्या हम इतने नासमझ हैं?

शनिवार, 13 फ़रवरी 2016

JNU में पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे ABVP ने लगाए

JNU में पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे ABVP ने
लगाए, सुबूत के तौर पर वीडियो जारी
9 फरवरी की शाम अफज़ल गुरू
की याद में हुए प्रोग्राम के बाद प्रतिष्ठित जवाहरलाल
नेहरू विश्वविद्यालय सुर्खियों में है। देश में राष्ट्रीय
समाचार चैनलों का एक गुट जेएनयू और वहां पर सक्रिय
वामपंथी संगठनों पर हमलावर है। समाचार चैनलों के
कुछ एंकर इस विश्वविद्यालय को खुलेतौर पर देशद्रोहियों का गढ़
कह रहे हैं। जेएनयूएसयू के मौजूदा प्रेसिडेंट कन्हैया कुमार
की गिरफ्तारी के बाद ऐसे चैनलों को अपने
अजेंडा में कामयाबी भी मिल
रही है।
ये भी पढ़ें- पाक जिंदाबाद कहने वालों की
जबान क्यों न काट दी जाए?
हालांकि इसी दौरान सोशल मीडिया पर वायरल
एक वीडियो में ऐसे न्यूज़ चैनलों को एक्सपोज़ करने के
अलावा एबीवीपी पर
भी सनसनीखेज़ आरोप लगाए गए हैं।
वायरल वीडियों में दावा किया गया है कि 9
फरवरी की रात जेएनयू कैंपस में
वामपंथी छात्रों को फंसाने के मकसद से
एबीवीपी कार्यकर्ताओं ने
पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगाए थे।
'द कंस्प्रेसी' नाम से जारी इस
वीडियो के मुताबिक 'जेएनयू के बारे में
मीडिया जो दिखा रहा है, वह पूरी तरह
से बायस्ड, अधूरा और सनसनीखेज है।
वीडियो में जब पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे सुनाई दे रहे
हैं, उस वक्त स्क्रीन पर
एबीवीपी के कार्यकर्ता दिख
रहे हैं। इसके बाद जब पीछे से पाकिस्तान ज़िंदाबाद के
नारों की आवाज़ आ रही है तो
वीडियो में दिख रहे
एबीवीपी कार्यकर्ता जवाब में
ज़िंदाबाद जिंदाबाद बोल रहे हैं।
ये भी पढ़ें- केजरी की
ललकार, मोदीजी भारी
पड़ेगी कन्हैया की गिरफ्तारी
वीडियो में मीडिया पर सवाल खड़ा करते
हुए कहा गया है कि वह पूरा सच नहीं दिखा रहा
है। दावा यह भी किया गया है कि यह
एबीवीपी की
साज़िश है ताकि गैर एबीवीपी
छात्रों पर झूठे मुकदमे दर्ज करवाए जा सकें।

सौजन्य : लाईव ईंन्डीया Click Here.

JNU की घटना RSS के माइंड की उपज है।

हैदराबाद विश्वविद्यालय के दलित छात्र रोहित वेमुला के मामले में ABVP की जो फजीहत हुयी है, एवं RSS के राष्ट्रवाद ( जो राजतंत्र को मजबूत व लोकतन्त्र को नष्ट करने के उद्देश्य से लाया गया है) को धक्का लगा है। इन दोनो को मजबूत करने व दलित  पिछड़े एकता को नष्ट करने के उद्देश्य से JNU कार्यक्रम लाया गया लगता है। बहुत कुटिल नीति के तहत इस कार्यक्रम को आयोजित कराया गया।जरा सोचो जब JNU ने इस कार्यक्रम की अनुमति नही थी तो हो कैसे गया। इतना बड़ा कार्यक्रम आयोजन की तैयारी की गयी होगी। तैयारी के समय इसका विरोध या पुलिस कार्यवाही क्यो नही हुयी। मुद्दा जो तैयार करना था । इस कार्यक्रम से राष्ट्रवादियो ने कई निशाने साधे।
१- हैदराबाद के रोहित मामले में भाजपा, व ABVP की हुयी फजीहत को दबाना ।
२- रोहित मामले से उपजी दलित पिछड़े मुस्लिम एकता को नष्ट करना।
३-  RSS व उसके आनुसॉगिक संगठनों को राष्ट्र हितैषी सिद्ध करना, ताकि RSS का लोकतन्त्र को नष्टकर राजतंत्र को मजबूत करने का दूरगामी आन्दोलन की पोल न खुले।
४- देश में ब्राम्हणों के प्रति उभर रही नफरत को दबाना।
५- भाजपा को पिछले चुनावो में मिली करारी हार के बदले देश को हिन्दू मुस्लिम लड़ाई में बदलने की तैयारी।
    भाइयो लोकतन्त्र के लिये इतना खतरनाक JNU का कार्यक्रम नही जितना खतरनाक RSS व उसके आनुसॉगिक संगठनों का राष्ट्रवाद का कार्यक्रम व दलितो पिछड़े व मुस्लिमों की अभिव्यक्ति को दबाना है। राष्ट्रवाद लोकतन्त्र के लिये सबसे बड़ा खतरा है। हमारे लोग इसे समझे।इसका जवाब इसप्रकार निकाले कि बिना विरोध के राष्ट्रवाद की विचारधारा को नष्ट किया जा सके, अन्यथा लोकतन्त्र का नष्ट होना तय है। अगर किसी भाई को राष्ट्रवाद देश व जनहित में लग रहा हो तो एक बार राष्ट्रवाद के उत्पत्ति का इतिहास पढ ले और यह जानने का प्रयास करे कि राष्ट्रवाद व देशभक्ति की संकल्पना क्यो गढी गयी।

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