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मंगलवार, 8 मार्च 2016

क्योंकि वो ही इस देश के ठेकेदार हैं

मेरे प्यारे मित्रों...
हम सभी को पता है कि लोकतन्त्र का चौथा स्तम्भ मीडिया है, अगर मीडिया जिम्मेदारी पूर्वक अपना कर्तव्य निभाए तो तकरीबन भारत में पनप रही व पनप चुकी समस्याएं खत्म हो जाएँ |
देशद्रोह नामक शब्द पर सभी अपने अपने तरीके से व्याख्या कर रहे हैं तकरीबन सभी नफरत फ़ैलाने वाले न्यूज चैनल दिखा रहे हैं कि कैसे कन्हैया कुमार ने देशविरोधी नारे लगाये...जिससे देश की एकता व अखण्डता को खतरा पैदा हो गया है|
भारत में अनेक विचारधारा के लोग रहते हैं, लेकिन कोई अपनी विचारधारा किसी पर थोप नहीं सकता| अभिव्यक्ति की आजादी है बशर्ते यह देश की अक्षुणता को खतरा न पहुंचाए...
क्या नारे लगाने से कोई देशद्रोही हो गया? यदि देशद्रोही है तो उसके पास ए के 47 , गोली बारूद का जखीरा , व आतंकियों से संपर्क के सबूत होने चाहिए थे, क्या मीडिया ने वो दिखाए?

कुछ गला फाड़ फाड़ कर चिल्लाने वाले लोगों ने तो पूरे जे एन यू को राष्ट्र विरोधी गतिविधियों का अड्डा बता डाला, यहां तक कि जे एन यू को बन्द करने की मांग भी उठने लगी....
मजे की बात जहां राष्ट्र विरोधी गतिविधियाँ होती हैं, पाक अधिकृत कश्मीर में...वहां पर सेना हमला क्यों नहीं करती क्योंकि उन्हें इजाजत नहीं दी जाती?
हमारे जवानों के सर काट लिए जाते हैं, पर हम नहीं काट सकते क्योंकि पीछे से इजाजत नहीं मिलती | इजाजत मिलती है पी एच डी कर रहे रोहित वेमुला व उसके साथियों पर आरोप लगाकर उन्हें विश्विद्यालय से बाहर निकालने की....कन्हैया कुमार को देशद्रोह के आरोप में जेल में बन्द करने की |
क्या देशद्रोह करना बच्चों का खेल है, क्या देशद्रोह पर बात करने वाले जानते हैं कि देशद्रोह की परिभाषा क्या है?

असीम चतुर्वेदी , अरुन्धिति रॉय पर भी देशद्रोह के आरोप लगे हैं......
पर आरोप लगाना बड़ा आसान है पर उसे सिद्ध करना बड़ा मुश्किल |
कन्हैया कुमार को उच्च न्यायालय ने जमानत दे दी है क्योंकि उसके खिलाफ देशद्रोह से सम्बंधित कोई भी साक्ष्य नहीं मिला है...
अभी कल ही न्यूज चैनल पर दिखाया गया कि एक देशभक्त कन्हैया को मारने वाले को इनाम देंगे |
पूरा देश मीडिया ने जे एन यू प्रकरण पर जला रखा है, नफरत की दीवार बनाई जा रही है क्योंकि मीडिया अब सच नहीं किसी की कठपुतली बन गया है|
भारत में और भी बहुत समस्याएं हैं, सुदूर के गांवों में बिजली, पानी, शिक्षा अब भी कोसों दूर है, जो हमें राजधानी व उसके आस पास बैठने से दिखाई नहीं दे सकतीं|

यदि कोई देशद्रोही है तो कानून अपना काम कर रहा है, अदालतें न्याय दे रही हैं, अगर देशद्रोह सिद्ध होता है तो सजा मिलेगी.....लेकिन कुछ देश तोड़ो मानसिकता के स्वामी स्वयं जज बन बैठे हैं, क्योंकि वो ही इस देश के ठेकेदार हैं |

अब बन्द करो मीडिया....
समाज में नफरत की खाई पैदा करना...
सौ -sunil premi

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

देशद्रोह के आरोपी छात्रो का परिचय और भविष्य का संकट।

जेएनयू के जिन छात्रों से देश को खतरा है, हमारे लिए उनका परिचय जानना जरूरी है।

1. कन्हैया कुमार-  छात्रसंघ अध्यक्ष। पिताजी अपाहिज है तथा माँ तीन हजार रू पगार में आँगनवाडी में कार्य करती है, उनकी कमाई से ही पूरे परिवार का पेट पलता है।

2. राम नागा - छात्रसंघ महासचिव। गरीब दलित परिवार से है। भूखमरी के लिए कुख्यात कालाहांडी के निवासी हैं।

3. चिंटु कुमारी - छात्रसंघ की पूर्व महासचिव। बिहार के दलित परिवार से है। इसकी माँ चूडियाँ बेचकर घर चलाती है।

4. लेनिन कुमार - छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष। तमिलनाडु के निवासी। न पूरी तरह अंग्रेजी जानते हैं, न हिन्दी। बावजूद जेएनयू ने उन्हे अपना नेता चुना।

5. उमर खालिद - नास्तिक है। इन्होंने येल विश्वविद्यालय की फैलोशिप का प्रस्ताव इसलिए ठुकरा दिया, क्योंकि उन्हें दलित व आदिवासियों के लिए काम करना था।
               इनमें से किसी के खिलाफ अभी तक पुलिस एक भी सबूत पेश नहीं पेश कर सकी । और जो सबूत पेश किये गए वे फर्जी निकले। बावजूद इन्हें देशद्रोही करार देकर पूरे देश में बदनाम कर दिया गया। गरीब, मजदूर, किसान और दलित परिवार से आने वाले ये बच्चे देशद्रोही हो गये और जनता का लाखों करोडो पैसा लूटकर विदेशी बैंकों में जमा करने वाले सबसे बड़े देश भक्त हो गये। सरकार ने उन्हीं देशभक्त कारोबारी घरानों के एक हिस्से के 1 लाख 14 हजार करोड़ रूपये माफ कर दिये । न कोई  चूं हुई और न ही चर्चा। दरअसल बीजेपी मनुवादी कोख से पैदा हुई पार्टी है। लिहाजा इसका बुनियादी चरित्र ही दलित, आदिवासी, महिला, गरीब, मुस्लिम विरोधी है।कॉरपोरेट परस्त होने के नाते मजदूरों, किसानों और प्रगतिशील विचार रखने वाले नौजवानों से 36 का रिश्ता है। केन्द्र सरकार इनकी समस्याओं का हल करने के बजाय समस्याओं का स्रोत बन गई है।
         लोकतंत्र संस्थाओं से चलता है। लेकिन आज संस्थाओं को ही अपाहिज किया जा रहा है। फांसीवाद का जन्म ऐसे ही होता है। संकट की इस घड़ी में लोकतांत्रिक प्रगतिशील विचार रखने वाली ताकतों को एकजुटता दिखाते हुए अपने अपने मोर्चों पर मुश्तेन्दी दिखाना जरूरी हो गया है। अभी एकजुट नहीं हुए, तो फिर बहुत देर हो चुकी होगी।

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2016

लोकतंत्र दिन को "काला दिन" मनाने वालो पर अब तक देशद्रोह की कारवाई नहीं हुई है..

देश द्रोह की सुप्रीम कोर्ट ने व्याख्या की है
" देश के विरोध में कृती करना "
भारत देश में जब से  आक्रमणकारी विदेशी आर्यब्राम्हण आए हैं, तब से लेकर आजतक यह ब्राम्हण देश विरोधी कृती करते आ रहे हैं, और आज भी करते हैं ।
विदेशी आर्यब्राम्हण भारत देश में आने के पहले यहाँ एकसंघ समाज था ।
विदेशी आर्यब्राम्हणो ने एकसंघ भारतीय समाज को जाती-जाती में बांट दिया ।
जाती के आधार पर भेदभाव किया गया ।
भारतीय समाज को मानवी मूल्ये,अधिकार  नकारे गए । यह सब कृतीयाॅ अमानवीय,    समाज द्रोही, राष्ट्र द्रोही, देश विरोधी कृती है । जो  आज भी होती है । देश में हर दिन ऐसी कई घटनाएं घटती है । परंतु आज तक किसी समाज घातकी,देश घातकी, विदेशी आर्यब्राम्हणो पर  देश द्रोह का गुनाह नहीं लगाया गया ।"समाज को तोडना मतलब देश को तोडना है"।और यह काम ब्राम्हणों का ब्राम्हणवाद करता है इसलिए देश में "सबसे बड़ा आंतकवाद, ब्राम्हणवाद है "।और इसे ब्राम्हणो का संघटन " राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ " आरएसएस चलाता है । आर एस एस अपनी कई संगठन जैसे एबीवीपी, बजरंग दल, भा.ज.प, विश्व हिन्दू परिषद,हिन्दू महासभा, सनातन संस्था  र्इत्यादी के माध्यम से देश में ब्राम्हणवाद का काम करते रहते है ।और ब्राम्हणी व्यवस्था  को बरकरार रखने का काम करते रहते है । "लोकतंत्र दिन"(26 जनवरी )
को  "काला दिन मनाना " यह देश विरोधी कृती है, तो भी लोकतंत्र दिन को " काला दिन" मनाने वालो पर अब तक देश द्रोह की कारवाई  नहीं हुई है । भारत देश के आजादी के आंदोलन में आर एस एस के लोग नहीं थे, इनके  नेताओं ने ब्रिटिश सरकार को लिखकर दिया था कि, हमारा  भारत देश के आजादी के आंदोलन से कोई संबंध नहीं है । यह देश के  विरोध में कृती है । इस देश का नाम "भारत " है । और यह नाम संविधान समिति ने सर्वसम्मति से मंजूर किया गया है । तो भी आर एस एस के  विदेशी आर्यब्राम्हण भारत देश को हिन्दूस्तान कहते हैं। यह देश विरोधी कृती है । आर एस एस के विदेशी आर्यब्राम्हण  भारत देश में अलग-अलग विवाद कर के  मूलभारतीयों में झगड़े लगाने का काम करते हैं । जैसे जातीवाद, प्रांतवाद, भाषावाद, मंदिर वाद,  गायवाद, उच्च-ऐनिच्च वाद, हिंदू - मुस्लिम वाद, हिंदू - इसाई वाद इत्यादी वाद निर्माण करके मूलभारतीय समाज में झगड़े लगाने का काम करते रहते है । और देश में  अशांति  रहे, इसके लिए  का काम करते रहते है । यह काम समाज और राष्ट्र निर्माण में बाधा उत्पन्न करने वाला  काम है । और यह काम विदेशी आर्यब्राम्हण सदियों से करते आ रहे है, और आज भी करते हैं ।   इन जातीवादी, विषमतावादी विदेशी आर्यब्राम्हणो के ब्राम्हणी व्यवस्था के विरोध में, कोई मूलभारतीय मानवी मूल्यों के आधार पर अगर बात करता है, बोलता है, तो उस पर देश विरोधी कारवाई की जाती है । यह  "उल्टा चोर, कोतवाल को डांटे," जैसा है ।
जो मूलभारतीय संविधान की बात करते हैं, अपने अधिकारों की बात करते हैं, विदेशी आर्यब्राम्हण उसे  देश विरोधी कहते हैं । हैदराबाद विश्वविद्यालय  का रोहीत वेमूला, जो कि "पी एच डी.की पढाई कर रहा था । वह भारतीय संविधान ने हर भारतीयोंको दिए, अपने अधिकारों के प्रति जागृत था, यही बात विदेशी आर्यब्राम्हणो के आर एस एस सरकार को नहीं जची। रोहित वेमूला समतावादी राष्ट्रपिता ज्योतीबा फुले,  राष्ट्रनायक शाहु महाराज , राष्ट्रनिर्माते डाॅ. बाबासाहेआंबेडकर, पेरियार रामसामी इन भारतीय महापुरुषोंके विचारों का प्रतिनिधित्व करता था । मानवी मूल्यों के विचारों का  आदान-प्रदान करता था । और उसी  विश्वविद्यालय में विषमतावादी, जातीयवादी,विदेशी आर्यब्राम्हणो का  आर एस एस का कार्यरत संघटन " एबीवीपी " को  रोहीत के  विचारों से  बाधा उत्पन्न हुई, उसके साथ जाती के आधार पर भेदभाव किया गया । उसे प्रताड़ित किया गया । उसका दमन,शोषण किया गया ।  विश्वविद्यालय से, होस्टल से,लायब्रेरी से संस्था के पूरे परिसर से रोहित और उसके साथी  को बाहर निकाला गया । वह आम रस्ते पर रहे ।और आखिरकार जातीवादी, विषमतावादी ब्राम्हणी व्यवस्था ने  रोहित  को बली चढा दिया गया । यह ब्राम्हणी व्यवस्था का "Institutional Murder" है ।  यह देश विरोधी कृत्ये है । और आर एस एस सरकार ने अपने देश विरोधी ओ पर अब तक कोई कारवाई नहीं की है ।
देश में ऐसे मूलभारतीयोंको, समतावादी, मानवी मूल्यों का आदान-प्रदान करने से, विषमतावादी  विदेशी आर्यब्राम्हणो को  बाधा उत्पन्न हुई, उसके कारण कई मूलभारतीयोंको अपने प्राण गंवाए पडे ।
"सामाजिक समता राष्ट्र निर्माण है । और       विदेशी ब्राम्हण इसके विरोध में है।"
सामाजिक समता और राष्ट्र निर्माण के लिए जिन मूलभारतीयों ने काम किए,उनके साथ विदेशी आर्यब्राम्हणो ने दूर्व्यवहार किये हैं, उनकी हत्याएँ की गयी है । हत्या के प्रयास किए गए हैं ।  उनके साथ छल कपट किए गए हैं ।  और यह सब, जब से आक्रमणकारी विदेशी आर्यब्राम्हण भारत देश में आए हैं, तब से लेकर आजतक इनके करतूतें जारी है ।

शनिवार, 20 फ़रवरी 2016

अब देशद्रोही घोषित होने की बारी हरियाणा के जाटो की है

गुजरात में हार्दिक पटेल देशद्रोही आरोपित हो चुके है !
राजस्थान में गुर्जर लगभग ऐसा ही दंश झेल रहे है !
चूँकि देश ने तथाकथित रूप से पहला ओबीसी प्रधानमंत्री चुना है इसलिये चुन-चुन कर ओबीसी जातियो की ऐसी-तैसी करेगा !!
कुछ भी लिखने से पहले याद रखियेगा वहाँ आंदोलनकारियों को उपद्रवी मानकर देखते ही गोली मारने के आदेश है !

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2016

जेएनयू के बहाने देशभक्ति और देशद्रोह पर छिड़ी इस पूरी बहस के अलग-अलग पक्ष

जो लोग यह मान रहे हैं कि महज दस लड़कों के कुछ नासमझी भरे नारों के लिए जेएनयू को बदनाम किया जा रहा है, वे दरअसल एक भारी भूल कर रहे हैं। यह जेएनयू से ज्यादा जेएनयू की अवधारणा है जो बीजेपी, संघ परिवार और दक्षिणपंथी विचारधारा को स्वीकार्य नहीं है।

जेएनयू के बहाने देशभक्ति और देशद्रोह पर छिड़ी इस पूरी बहस के अलग-अलग पक्षों को देखें तो यह बात साफ़ तौर पर समझ में आ जाएगी। मसलन जो लोग जेएनयू के नारों का विरोध कर रहे हैं, वे हैदराबाद यूनिवर्सिटी में रोहित वेमुला की ख़ुदकुशी से भी आंख मिलाने को तैयार नहीं हैं। जो लोग जेएनयू को देशद्रोहियों का अड्डा बता रहे हैं, वे मूलतः आरक्षण विरोधी और उदारीकरण के समर्थक तत्व हैं। जो लोग मानते हैं कि जेएनयू आज़ादी के नाम पर अराजकता फैला रहा है, वे स्त्री की बराबरी और आज़ादी के भी ख़िलाफ़ खड़े लोग हैं।

ये वही लोग हैं जो कश्मीर समस्या और माओवाद के संकट को किसी आंतरिक परिस्थिति की तरह देखने को तैयार नहीं हैं, बल्कि यह चाहते हैं कि इनका उस तरह दमन कर दिया जाए जैसे आक्रांता सेनाएं किसी दूसरे देश के नागरिकों का करती हैं। यही वे लोग हैं जो जातिवाद को गलत बताते हैं लेकिन अपनी जाति के बाहर जाकर शादी करने को तैयार नहीं होते और अख़बारों में बिल्कुल जातिगत पहचानों वाले विज्ञापन देते हैं। ये वही लोग हैं जिन्हें दलितों का, पिछड़ों का, अल्पसंख्यकों का और स्त्रियों का आगे बढ़ना नहीं सुहाता। ये वही लोग हैं जो सरकारी या केंद्रीय विश्वविद्यालयों के सामाजिक माहौल में नहीं जाते और निजी तकनीकी संस्थानों की मूलतः कारोबारी शिक्षा वाली व्यवस्था को सबसे आदर्श मानते हैं।

यही वे लोग हैं जो मानते हैं कि विश्वविद्यालयों में बस कोर्स पूरा करना चाहिए और डिग्री लेकर एक अच्छी नौकरी करनी चाहिए, बहस नहीं करनी चाहिए और राजनीति तो बिल्कुल नहीं। यही लोग हुसैन की कलाकृतियां जलाते हैं, हबीब तनवीर के नाटकों में बाधा डालते हैं और लेखकों के विरोध को राजनीतिक साज़िश की तरह देखते हैं। फिर यही वे लोग हैं जो अयोध्या में एक भव्य राम मंदिर चाहते हैं, जैश-लश्कर से लेकर आईएस-अल क़ायदा तक की मिसालें देते हुए साबित करते हैं कि मुसलमान आतंकवादी हैं और शिकायत करते हैं कि इसी मुल्क में बोलने की इतनी आज़ादी है कि लोग देश और धर्म की भी आलोचना कर बैठते हैं।

दूसरी तरफ जो लोग रोहित वेमुला के अकेलेपन और उसकी बिल्कुल प्राणांतक उदासी में साझा करते हैं, वही कन्हैया और उसके साथ खड़े होने का दम दिखाते हैं। जो लोग इस पूरी व्यवस्था में हाशिए पर हैं, जो चंपू पूंजीवाद और अलग-अलग सत्ताओं के गठजोड़ से बनी एक बेईमान और अन्यायपूर्ण राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था के शिकार हैं, वे देश के नाम पर ठगे जाने को तैयार नहीं हैं। इत्तिफाक से यही वे लोग हैं जो नई बहसों, नए चलनों, नए राजनीतिक प्रयोगों और नई क्रांतियों के वाहक हैं और अपने-अपने संस्थानों और विश्वविद्यालयों में अति तक जा सकने वाली बहसें करते रह सकते हैं।

यही वे लोग हैं जो कलबुर्गी, पंसारे और दाभोलकर के मारे जाने का विरोध करते हैं, इसके लिए प्रदर्शन करते हैं और अपने पुरस्कार लौटाते हैं। अगर ध्यान से देखें तो बंगाल से महाराष्ट्र तक, छत्तीसगढ़ से तेलंगाना तक और गुजरात से कर्नाटक तक जो लोग कहीं मेधा पाटकर की बांध विरोधी लड़ाई में शामिल हैं, कहीं उदयकुमार के साथ ऐटमी कारख़ानों का विरोध कर रहे हैं, कहीं सोनी सोरी के साथ हुए अत्याचार को उजागर कर रहे हैं, कहीं अख़लाक के मारे जाने का मातम मना रहे हैं, कहीं गैंगरेप की शिकार किसी लड़की के हक़ में आंदोलन कर रहे हैं और कहीं मानवाधिकार की किसी दूसरी लड़ाई के सिपाही बने हुए हैं, वही हैदराबाद से जेएनयू तक पसरे हुए हैं। ये एक अलग सा भारत है- बहुत सारे रंगों से भरा हुआ, बहुत सारे विश्वासों से लैस, बहुत सारी बहसें करता है, बहुत सारे अभावों के बीच गुज़रता हुआ, कहीं पिटता हुआ, कहीं जेल जाता हुआ- जो इस देश पर शासन कर रही सरकारों को समझ में नहीं आता है। वे इस भारत को कुचलना चाहती हैं, क्योंकि वह असहमति जताता है, सवाल पूछता है, नारे लगाता है और कभी-कभार अपनी हताशा या अपने गुस्से में अपने अलग होने की बात भी कह डालता है।

यह लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं हैं

जेएनयू की घटना को जिस तरह से टीवी चैनलों में कवर किया गया है उसे आप अपने अपने दल की पसंद की हिसाब से मत देखिये। उसे आप समाज और संतुलित समझ की प्रक्रिया के हिसाब से देखिये। क्या आप घर में इसी तरह से चिल्ला कर अपनी पत्नी से बात करते हैं। क्या आपके पिता इसी तरह से आपकी मां पर चीखते हैं। क्या आपने अपनी बहनों पर इसी तरह से चीखा है। ऐसा क्यों हैं कि एंकरों का चीखना बिल्कुल ऐसा ही लगता है। प्रवक्ता भी एंकरों की तरह धमका रहे हैं। सवाल कहीं छूट जाता है। जवाब की किसी को परवाह नहीं होती। मारो मारो, पकड़ो पकड़ो की आवाज़ आने लगती है। एक दो बार मैं भी गुस्साया हूं। चीखा हूं और चिल्लाया हूं। रात भर नींद नहीं आई। तनाव से आंखें तनी रही। अक्सर सोचता हूं कि हमारी बिरादरी के लोग कैसे चीख लेते हैं। चिल्ला लेते हैं। अगर चीखने चिल्लाने से जवाबदेही तय होती तो रोज़ प्रधानमंत्री को चीखना चाहिए। रोज़ सेनाध्यक्ष को टीवी पर आकर चीखना चाहिए। हर किसी को हर किसी पर चीखना चाहिए। क्या टीवी को हम इतनी छूट देंगे कि वो हमें बताने की जगह धमकाने लगे। हममें से कुछ को छांट कर भीड़ बनाने लगे और उस भीड़ को ललकारने लगे कि जाओ उसे खींच कर मार दो। वो गद्दार है। देशद्रोही है। एंकर क्या है। जो भीड़ को उकसाता हो, भीड़ बनाता हो वो क्या है। पूरी दुनिया में चीखने वाले एंकरों की पूछ बढ़ती जा रही है। आपको लगता है कि आपके बदले चीख कर वो ठीक कर रहा है। दरअसल वो ठीक नहीं कर रहा है।

कई प्रवक्ता गाली देते हैं। मार देने की बात करते हैं। गोली मार देने की बात करते हैं। ये इसलिए करते हैं कि आप डर जाएं। आप बिना सवाल किये उनसे सहमत हो जाएं। हमारा टीवी अब आए दिन करने लगा है। एंकर रोज़ भाषण झाड़ रहे हैं। जैसे मैं आज झाड़ रहा हूं। वो देशभक्ति के प्रवक्ता हो गए हैं। हर बात को देशभक्ति और गद्दारी के चश्मे से देखा जा रहा है। सैनिकों की शहादत का राजनीतिक इस्तेमाल हो रहा है। उनके बलिदान के नाम पर किसी को भी गद्दार ठहराया जा रहा है। इसी देश में जंतर मंतर पर सैनिकों के कपड़े फाड़ दिये गए। उनके मेडल खींचे गए। उन सैनिकों में भी कोई युद्ध में घायल है। किसी ने अपने शरीर का हिस्सा गंवाया है। कौन जाता है उनके आंसू पोंछने।

शहादत सर्वोच्च है लेकिन क्या शहादत का राजनीतिक इस्तेमाल भी सर्वोच्च है। कश्मीर में रोज़ाना भारत विरोधी नारे लगते हैं। आज के इंडियन एक्सप्रेस में किसी पुलिस अधिकारी ने कहा है कि हम रोज़ गिरफ्तार करने लगें तो कितनों को गिरफ्तार करेंगे। बताना चाहिए कि कश्मीर में पिछले एक साल में पीडीपी बीजेपी सरकार ने क्या भारत विरोधी नारे लगाने वालों को गिरफ्तार किया है। हां तो उनकी संख्या क्या है। वहां तो आए दिन कोई पाकिस्तान के झंडे दिखा देता है, कोई आतंकवादी संगठन आईएस के भी।

कश्मीर की समस्या का भारत के अन्य हिस्सों में रह रहे मुसलमानों से क्या लेना देना है। कोई लेना देना नहीं है। कश्मीर की समस्या इस्लाम की समस्या नहीं है। कश्मीर की समस्या की अपनी जटिलता है। उसे सरकारों पर छोड़ देना चाहिए। पीडीपी अफज़ल गुरु को शहीद मानती है। पीडीपी ने अभी तक नहीं कहा कि अफज़ल गुरु वही है जो बीजेपी कहती है यानी आतंकवादी है। इसके बाद भी बीजेपी पीडीपी को अपनी सरकार का मुखिया चुनती है। यह भी दुखद है कि इस बेहतरीन राजनीतिक प्रयोग को जेएनयू में कुछ छात्रों को आतंकवादी बताने के नाम पर कमतर बताया जा रहा है। बीजेपी ने कश्मीर में जो किया वो एक शानदार राजनीतिक प्रयोग है। इतिहास प्रधानमंत्री मोदी को इसके लिए अच्छी जगह देगा। हां उसके लिए बीजेपी ने अपने राजनीतिक सिद्धांतों को कुछ समय के लिए छोड़ा उसे लेकर सवाल होते रहेंगे। अफज़ल गुरु अगर जेएनयू में आतंकवादी है तो श्रीनगर में क्या है। इन सब जटिल मसलों को हम हां या ना कि शक्ल में बहस करेंगे तो तर्कशील समाज नहीं रह जाएंगे। एक भीड़ बन कर रह जाएंगे। यह लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है।

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2016

बड़ा खुलासा: कन्हैया ने नहीं लगाए देश विरोधी नारे!

नई दिल्ली: जेएनयू में देश विरोधी नारे को लेकर देश में हंगामा मचा है लेकिन अब इस मामले में एक नया मोड़ आता दिख रहा है जो पूरे विवाद का रूख पलट सकता है. न्यूज़ एजेंसी पीटीआई ने गृह मंत्रालय के अधिकारियों के हवाले से रिपोर्ट दी है कि ऐसा हो सकता है कि कन्हैया ने न देश विरोधी नारे लगाए और न ही अफजल की बरसी पर हुए कार्यक्रम में कोई भड़काऊ भाषण ही दिया.

पीटीआई सूत्रों के हवाले से खबर दी है कि गृह मंत्रालय के अफसर ये मानते हैं कि कन्हैया के खिलाफ देशद्रोह का केस अति उत्साह में लिया गया कदम हो सकता है. खुफिया एजेंसियों ने भी गृह मंत्रालय को रिपोर्ट दी है कि हालांकि कन्हैया संसद हमले के दोषी अफजल की बरसी के कार्यक्रम में मौजूद था लेकिन उसने न भारत विरोधी नारे लगाए और न ही उसने ऐसा कुछ कहा जिससे उसपर देशद्रोह का केस बनता है.

बहेतर है मे देशद्रोही कहेलाऊ....

चलो , आज मै भी देशद्रोहीओ की कतार मे खडा हो ही जाता हुं !

अंग्रेजो के साथ मीलकर मुल्ककी मुखाल्फत करनेवाले संध और अझहर मसुद को करोडो की खैरात देकर मुक्त करनेवाली भाजपा के चरणकमल छुकर राष्ट्रभक्त कहेलाने से बहेतर है मै देशद्रोही कहेलाऊ !
देशके लीये नाखुन तक नही कटवानेवाले लोगोकी चाटुकारिता मुजे देशप्रेम का प्रमाणपत्र देती है तो ईससे बहेतर है मे देशद्रोही कहेलाऊ !

९० सालकी आयुमे जीवन का मोह जीसे झेडप्लस सुरक्षाके धेरेमे बाधे हुऐ है ऐसे मोहन भागवत की नंपुसक मानसिकता को स्वीकारने से बहेतर है ऊन्हे हर मौरचे पर ललकार कर राष्ट्रद्रोही कहेलाऊ !

सुरक्षा सौदो मे दलाली से रंगे जयचंदी हाथ थामने से बहेतर है ऊसकी बाजुऐ काटने के संधर्ष से मै रत रहेकर देशद्रोही कहेलाऊ !

अफजल गुरु को ग्लोरी सन्मान देनेवाली पीडीपी से हाथ मीलानेवाली सत्ताभुख का संधी निवाला खाने से बहेतर है की मै राष्ट्रद्रोही बन जाऊ !

भारत मे जन्म लेने पर साठ साल तक शर्मींदा रहे नरेन्द्र मोदी की लज्जाकी चादर ताने सोने से बहेतर है ऊनके खीलाफ देश को जगाने का देशद्रोह करु !

मेरी राष्ट्र भक्ति कीसीके प्रमाणपत्र की मोहताज नही है ! मेरी कलम संधी श्याही से नही रगो मे बहेते देशप्रेम के जजबे से चलती है ! मेरे कहेने और लीखने पर सिर्फ मेरा ऐकाधिकार है ऊसे कोईभी ऐरागैरा देशद्रोही होने का लेबल दीखाकर डरा नही सकता ! व्यक्तिओ का ऐनकाऊन्टर हो सकता है ऊनके विचारो का नही ! मै लीखता रहुगा तबतक की जबतक मे आपके विधटनकारी और तानाशाह रवैये की मुखाल्फत करनेवाला देशका आखरी व्यक्ति ही क्युं ना रहु ! मेरा देशद्रोही होना संधीओके देशप्रेम से बहेतर है !

सौ : राजेश ठाकर
( भारतीय नागरिक )

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