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सोमवार, 2 मई 2016

ખૂબ સરસ છે એટલે તમને મોકલું છું. ધર્મ અને વીજ્ઞાન

અંધશ્રદ્ધા છે આંધળી, વહેમને વંટોળે વહે;
અતીશ્રદ્ધા છે અવળચંડી, વેવલાપણાંનાં વાવેતર કરે.

યુરોપે અટપટાં યંત્રો શોધી ફીટ કર્યાં ફૅક્ટરીમાં;
આપણે સીદ્ધીયંત્રો બનાવી, ફીટ કર્યાં ફોટામાં.

પશ્ચીમે ઉપગ્રહ બનાવી, ગોઠવી દીધા અંતરીક્ષમાં;
આપણે ગ્રહોના નંગ બનાવી, મઢી દીધા અંગુઠીમાં.

જાપાન વીજાણુ યંત્રો થકી, સમૃદ્ધ બન્યું જગમાં;
આપણે વૈભવલક્ષ્મીનાં વ્રતો કરી, ગરીબી રાખી ઘરમાં.

અમેરીકા વૈજ્ઞાનીક અભીગમથી બળવાન બન્યો વીશ્વમાં;
આપણે ધાર્મીક કર્મકાંડો થકી, કંગાળ બન્યા દેશમાં.

પશ્ચીમે પરીશ્રમ થકી, સ્વર્ગ ઉતાર્યું આ લોકમાં;
આપણે પુજાપાઠ–ભક્તી કરી, સ્વર્ગ રાખ્યું પરલોકમાં.

ઍડવર્ડ જેનરે રસી શોધી, શીતળા નાબુદ કર્યા જગમાં;
આપણે શીતળાનાં મંદીર બાંધી, મુર્ખ ઠર્યા આખા જગમાં.

પર્યાવરણ–પ્રદુષણથી જયારે જગત આખું છે ચીંતામાં;
આપણે વૃક્ષો જંગલો કાપી, લાકડાં ખડક્યાં ચીતામાં..

વાસ્તુશાસ્ત્રનો દંભ ને વળગાડ, લોકોને પીડે આ દેશમાં;
ફાલતુશાસ્ત્ર છે એ, છેતરાશો નહીં, ઠગનારા ઘણા છે આ દેશમાં.

સાયંટીફીકલી બ્લડ ચૅક કરી, ઍંગેજમેન્ટ કરે પશ્ચીમમાં,
સંતાનોને ફસાવી જન્મકુંડળીમાં, લગ્નકુંડાળાં થાય આ દેશમાં.

લસણ–ડુંગળી–બટાકા ખાવાથી પાપ લાગે આ દેશમાં,
આખી ને આખી બેન્ક ખાવા છતાં પાપ ન લાગે આ દેશમાં.

Jay Bhim
Copyed@Whatsapp

रविवार, 21 फ़रवरी 2016

बहन होनी चाहीयें

कैसी भी हो एक बहन होनी चाहिये..........।

बड़ी हो तो माँ- बाप से बचाने वाली.

छोटी हो तो हमारे पीठ पिछे छुपने वाली....॥

बड़ी हो तो चुपचाप हमारे पाँकेट मे पैसे रखने वाली,

छोटी हो तो चुपचाप पैसे निकाल लेने वाली...॥

छोटी हो या बड़ी, छोटी-छोटी बातों पे लड़ने वाली,

एक बहन होनी चाहिये.......॥

बड़ी हो तो ,गलती पे हमारे कान खींचने वाली,

छोटी हो तो अपनी गलती पर,साँरी भईया कहने वाली...

खुद से ज्यादा हमे प्यार करने वाली एक बहन होनी चाहिये....

बहन तु मुजे जान से प्यारी हैं

कभी कोई आया था ज़िंदगी मे...
तो चिढन सी थी की मेरे हिस्से का प्यार कम हो
गया....
माँ की गोद मुझसे छिन किसी और को मिल
गयी....
पिताजी की नज़रो मे कोई और चेहरा चढ़ गया....
नाराज़ था मैं उससे क्यूँ आई वो...
छिन गया था मुझसे मेरा संसार....
मौका मिलते ही उसे परेशान करता था
खींचता था उसके बाल....
पर कभी उसकी प्यारी सूरत देखकर प्यार आ जाता
था
तो मुँह सड़ाकर चला जाता था....
अपने कमरे से छिप्कर उसे मुँह चिढ़ाता था....
पर वो सच मे बहुत प्यारी थी...
इसीलिए सबकी दुलारी थी....
उसकी आँखें मुझे देख कर खिल उठती थी....
टुक टुक कर मुझे ही देखती रहती थी....
शायद वो मुझसे कुछ कहना चाहती थी....
मेरी भी गोद मे आकर रहना चाहती थी....
फिर मेरे भी हाथ उसे गोद मे लेने को मचलने लगे....
थोड़ा थोड़ा उसकी बातें समझने लगे....
मेरे मन का युद्ध समाप्त हुआ....
जब उसने अपनी छोटी सी उंगलियो से मुझे छुआ....
अब मैं अपने खिलौने उसके साथ खेलने लगा....
उसकी गुड़िया के हाथ और आँखें तोड़ने लगा...
टूटी चूड़ियाँ फटे हुए काग़ज़ जो भी थे....
मेरे बचपन के सारे ख़ज़ाने अब उसके भी थे....
अब वो धीरे धीरे मेरी उंगली पकड़ कर चलने लगी....
मेरे हान्थो से चॉक्लेट टॉफियाँ छीनने लगी....
फिर एक दौर आया जब हम बिछड़े....
उसकी एहमियत अब ज़्यादा समझ मे आने लगी....
सोते मे उसकी याद तकिया भिगाने लगी......
फिर दुबारा मिले लड़े झगड़े साथ रहे....
ज़िंदगी के सबसे प्यारे लम्हे बिताए....
साथ रोए, साथ खाए....
आज मैं यहा हूँ दूर उससे....
आँखों मे उसका चेहरा अब भी सताता है....
दिल रह रह कर उसी के पास चला जाता है....
पहले उसके हर जन्मदिन पर साथ थे....
अब वो हर साल मेरे बिना बड़ी होती है....
दिल मे इक टीस सी होती है....
एक दिन वो कहीं और चली जाएगी....
लगता है भाग दौड़ मे कट वो भी घड़ी जाएगी....
और मैं फिर यही आ जाऊँगा....
अपनी ज़िंदगी मे खो जाऊँगा....
वो पल जो उसके साथ थे....वो भी सताएँगे....
और पल जो उसके बिना कटे वो भी रुलाएँगे....
कभी कह नही पाया पर मैं उससे बहुत प्यार करता
हूँ....
हमेशा उससे मिलने की घड़ी का इंतज़ार करता हूँ....
वो तब भी मेरे लिए गुड़िया थी....
अब भी मेरी दुलारी है....
कभी कह नही पाया पर बहन....
पर तू मुझे जान से प्यारी है......
Copy@dilkikalam-dileep.blogspot.in

शनिवार, 20 फ़रवरी 2016

औकात पर आ जाते हैं लोग

थोड़ा सा खुल कर बात भी करे
तो औकात पर आ जाते हैं लोग ...
.
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लड़कियाँ बेचारी क्या करें
अपनी असली जात पर आ जाते हैं
लोग ...
.
.
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वो चाहती हैं
दोस्ती,पिकनिक, हंसी, मजाक,
मसखरी ...
पर उन्हें जो नापसंद है
उसी बात पर आ जाते हैं लोग ...
.
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.कुछ दिनों में उतर जाता है
चेहरे पर चढ़ा नकली रंग ...
.
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मौका मिलते हीअसली ख्यालात पर
आ जाते हैं लोग ...
.
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उनके लिए लडकियों की जिंदगी
शतरंज की बिसात से ज्यादा नहीं ...
.
सोच समझ कर जाल बिछाते हैं
.
और सीधे मात पर आ जाते हैं लोग ...
.
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क्यों न बन जाएचारदीवारी उनका
आशियाना ...
.
वो चाहती हैं दिन के उजाले
मगर रात वाली हरकतों पर आ जाते हैं
लोग...

रविवार, 3 जनवरी 2016

आज कलम का कागज से, मै दंगा करने वाला हूँ।

आज कलम का कागज से,
मै दंगा करने वाला हूँ।

मीडिया की सच्चाई को मैं,
नंगा करने वाला हूँ।

मीडिया जिसको लोकतंत्र का,
चौंथा खंभा होना था।

खबरों की पावनता में, 
जिसको गंगा होना था।

आज वही दिखता है हमको,
वैश्या के किरदारों में।

बिकने को तैयार खड़ा है,
गली चौक बाजारों में।

दाल में काला होता है,
तुम काली दाल दिखाते हो।

सुरा सुंदरी उपहारों की,
खूब मलाई खाते हो।

गले मिले सलमान से आमिर,
ये खबरों का स्तर है।

और दिखाते इंद्राणी का,
कितने फिट का बिस्तर है।

म्यॉमार में सेना के,
साहस का खंडन करते हो।

और हमेशा दाउद का,
तुम महिमा मंडन करते हो।

लोकतंत्र की संप्रभुता पर,
तुमने कैसा मारा चाटा है।

सबसे ज्यादा तुमने हिन्दू ,
मुसलमान को बाँटा है।   

दिल्ली में जब पापी वहशी,
चीरहरण मे लगे रहे।

तुम एश्श्वर्या की बेटी के,
नामकरण मे लगे रहे।

'दिल से' दुनिया समझ रही है,
खेल ये बेहद गंदा है।

मीडिया हाउस और नही कुछ,
ब्लैकमेलिंग का धंधा है।

गूंगे की आवाज बनो,
अंधे की लाठी हो जाओ।

सत्य लिखो निष्पक्ष लिखो,
और फिर से जिंदा हो जाओ ।।
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